जर्रे जर्रे में छुपा कहीं,
देखो वो आता है,
बहुत तलाशा उसको मेने,
पर जाने कोंन सताता है,
देखा एक रोज आइना मेने,
तो जाना कोंन रुलाता है,
समझ रहा था दिल मेरा,
उसको भी पहचाना था,
न था यकीं पर सच है,
वो मेरे घर ही रहता है,
दूर किया मेने उसको वो,
साथ साथ मेरे आता है,
वो यादो में आकर,
आँखों से लाखों नीर बहता है,
आज जाना की वो दर्द था,
जो बनके हँसी मुस्कुराता है,
जर्रे जर्रे में छुपा कहीं,
देखो वो आता है,

भाव-प्रवणता है रचना में,
ReplyDeleteछंदों का भी ध्यान रखें.
दिव्या नर्मदा को फोलो करें, कमेन्ट करें, लिखें
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आज जाना की वो दर्द था,
ReplyDeleteजो बनके हँसी मुस्कुराता है,
अच्छा कहा...
‘.जानेमन इतनी तुम्हारी याद आती है कि बस......’
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श्याम सखा ‘श्याम’
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