Monday, February 9, 2009

काश कुछ सपने सच हो पाते..

गुनगुनाते है बादल,
कुछ कहती है लहरे,
जमाने की हकीकत तो,
कुछ सपने सुनेहरे,
इनके बीच मै एक चाहत अधूरी सी...
अधूरे कुछ अनकहे अरमान मेरे॥

एक चाहत लहरों के साथ खेलने की,
तो एक तमन्ना असमान को छूने की,
है चाहत तो बस इतनी ही....

मैं बनके हवा कंही पर्वतों तक जाऊ,
मैं बनके घटा बदलो के संग मुस्कुराऊ,
और चाँद की चांदनी में लिपट कर,
फ़िर गीत कोई गुनगुनाऊ॥
है चाहत तो बस इतनी ही....

मैं हाथ बढाकर तारो को पा जाऊ।
मैं दूर गगन मैं तितली बनके मंङराऊ॥
मै फूलो के साथ साथ खिलू,
और फूल की खुसबू की तरह बिखर जाऊ,
है चाहत तो बस इतनी ही॥

कोई पास मेरे आए,
मुझे सपनो से मिला जाए,
कोई देके हँसी का गुब्बारा।
फ़िर रोज़ मुझको खूब हँसाये।
मैं सूरज की किरणों मै,
और सुनहरी हो जाऊ,
मैं तारो की ठंठक मै।
दिल को अपने बहलाऊ,
है चाहत तो बस इतनी ही...

काश कुछ सपने सच हो पाते॥
आँख खुलते ही न खो जाते,
मैं भी इनमे खो जाती,
अगर ये सपने सच हो जाते...

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