मैं एक नदी चंचल सी बहती हुई॥
जाने क्या सोचती जाती हूँ ॥
दूर कंही जाके धम जाऊ॥
सोचु फिर सायद में कंही,
बनके हवा फिर उड़ जाऊ॥
मैं एक नदी चंचल सी.....
जाने क्या सोचती जाती हूँ..
मुझे पाने को हर कोई यहाँ॥
रोज मुझसे मिलने आता है...
में दूर कंही जन्हा से आती हूँ॥
और फिर दूर कंही को जाती हूँ,
मैं एक नदी चंचल सी...
जाने क्या सोचती जाती हूँ ..
बारिश की बुँदे मुझको और मदहोश बनाती है॥
में संग संग लहरों के गीत फिर गुनगुनाती हूँ...
में पवन के झोंको के साथ मस्त होकर फिरती हूँ॥
में सूरज की किरणों में चांदी सी देखती हूँ॥
मैं डालकर के चुनर बादल की॥
फिर सागर से मिलने जाती हूँ...
मैं एक नदी चंचल सी...
जाने क्या सोचती जाती हूँ ....
मुझसे सब खुश रहते...
में सबके मन को भाती हूँ॥
में लहरों के साथ साथ,
हर दिल को छु जाती हूँ,
मैं एक नदी चंचल सी....
जाने क्या सोचती जाती हूँ ....
मैं एक नदी चंचल सी......
जाने क्या सोचती जाती हूँ ....
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