Friday, January 30, 2009

अनदेखी हवायें...

क्या है ये हवाए जो नज़र ही नही आती है,

सुबह सुबह ये बनकर कोई मधुर धुन,

मुझको प्यार से जगाने आती है,

हौले से ये आकर मुझको कुछ कह जाती है,

क्या है ये हवाए जो नज़र ही नही आती है.........
बनके ये घनघोर घटाए,सूरज को छुपा लेती है।

कभी कभी ये बनके बादल धरती को भीगा देती है,

कभी ये बनके ओस की बुँदे मोती सी बन जाती है,

क्या है ये हवाए जो नज़र ही नही आती है........
कभी कभी ये लहराती सी मुझको बैचैन कर देती है,

कभी तेजी से आकर ये जुल्फों के संग खेलती है,

मेरे हाथो को छुकर ये कुछ एहसास करा जाती है,

क्या है ये हवाए जो नज़र ही नही आती है........
कभी ये बनके बारिश मुझको खुश कर जाती है,

कभी चलती है मस्त होके मुझको संग ले जाती है,

न जाने ये आकर पास कितने संदेश दे जाती है,

दूर है जो अपने हमसे , उनको पास ले आती है।

क्या है ये हवाए जो नज़र ही नही आती है..........
रातो को ये थाप्किया देकर मुझको सुलाती है,

अपनी बांहों में लेकर मुझको माँ से मेरे मिलाती है ,

जब हौले से चलती है कोई गीत सुना जाती है

जब सो जाती हूँ में,ये मुझको झुला झुलाती है

क्या है ये हवाए जो नज़र ही नही आती है................

क्या है ये हवाए जो नज़र ही नही आती है..................

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